योग का रहस्यमय ज्ञान

   •योग का कहना है कि आज्ञाचक्र से एक निश्चित समय पर रोज़ एक द्रव पदार्थ विसर्जित होता है जिसे अमृतक्षरण कहते हैं। इसके फल स्वरुप मुख में लार बनती है और 'मध्यमा' वाणी' 'बैखरी वाणी' में परिवर्तित होकर मुख से शब्दों के रूप में उच्चारित होती है।(बैखरी वाणी के बिना कोई बोल नहीं सकता) उसी अमृततत्व से ह्रदय धड़कता है और उसीसे शरीर के स्वतंत्र तंत्रिका तंत्र अपना कार्य करते हैं। उस अमृत तत्व का मूल स्रोत है--'पीयूष ग्रंथि'। यह सोम चक्र की सीमा के अंतर्गत स्थित है। योगिगण आज्ञाचक्र की 'रुद्रग्रंथि' का भेदन कर नाभि ऊर्जा की सहायता से 'सोमचक्र' में स्थिति लाभ करते हैं और तदनन्तर उपलब्ध होते हैं अमृतत्व को जिसके फलस्वरूप उनके शरीर, मन, प्राण, मस्तिष्क आदि पर काल का प्रभाव अति मन्द (न के बराबर) गति से पड़ता है। वे दीर्घजीवी होते हैं और काल की सीमाओं का उल्लंघन कर सैकड़ों वर्ष पीछे अतीत में प्रवेश कर जाते हैं और इसी प्रकार सैकड़ों वर्ष आगे भविष्य में भी कर जाते हैं प्रवेश। इससे सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि अतीत के अँधेरे में डूबे ज्ञान-विज्ञान और उसके मूलभूत सिद्धांतों को प्रकाश में आने का अवसर प्राप्त होता है और इसी प्रकार प्राप्त होता है भविष्य में घटने वाली  प्राकृतिक, दैवीय और आसुरी घटनाओं का सम्पूर्ण विवरण भी। वास्तव में ऐसे योगी त्रिकालज्ञ होते हैं। तीनों कालों को करतलवत देखते हैं वे। वर्तमान समय में भी त्रिकालज्ञ योगियों का अस्तित्व है लेकिन उनको जानना, पहचानना और समझना अत्यन्त कठिन है।
     अमेरिकन वैज्ञानिक अरानल ने पीनियल ग्लैण्ड पर अत्यधिक शोध व अन्वेषण कार्य किया है। उनका कहना है कि पीनियल ग्लैण्ड से मस्तिष्क को 'सिरोटोनिन' मिलता है। यह सिरोटोनिन ही प्राणी को दिव्य दृष्टि प्रदान करता है और दूरबोध भी। इसीकी सहायता से प्राणी प्रत्यक्ष रूप से वस्तुओं को बिलकुल साफ-साफ देखता है। जिस प्राणी की पीनियल ग्लैण्ड से अत्यधिक मात्रा में सिरोटोनिन विसर्जित होता है, उसे अतीन्द्रिय और अलौकिक ज्ञान प्राप्त होता है। योगमार्ग का राही दोनों प्रकार के ज्ञान को उपलब्ध होने के लिए आज्ञाचक्र पर मन को स्थिर कर ध्यान लगाते हैं। ध्यान जब अपने आप गहन हो जाता है तो उस अवस्था में सिरिटोनिन की मात्रा बढ़ जाती है और उसीके अनुसार उसका विसर्जन भी होने लगता है। पीनियल ग्लैण्ड धूप, ताप, शीत, प्रकाश एवं चांदनी से अत्यधिक प्रभावित होता है। इसी कारण साधक योगी अपने मस्तिष्क को प्रायः अपने धर्म और संप्रदाय के अनुसार काले, नीले, सफ़ेद रंग के वस्त्रों से ढके रहते हैं ताकि आज्ञाचक्र वातावरण से प्रभावित न हो और उनके ध्यान में किसी भी प्रकार की बाधा उत्पन्न न हो। यदि पूर्णिमा की रात में चाँद की ओर अपलक स्थिर दृष्टि से देखा जाय तो उसका भारी प्रभाव पड़ता है पीनियल ग्लैण्ड पर और अपने आप में एक विशेष प्रकार का अलौकिक अनुभव होता है।  
  •   वास्तव में मानव शरीर का निर्माण  कोषिकाओं के समूह से हुआ है। प्रत्येक कोषिका के भीतर सामूहिक प्रक्रिया होती है और उसी सामूहिक प्रक्रिया का नाम जीवन है और मन अथवा चेतन है जिसमें सर्वव्यापकता के लक्षण मौजूद रहते हैं और रहते हैं सर्वज्ञता के लक्षण भी। वैज्ञानिक इस बात से सहमत हैं कि इंद्रियानुभूतियों की शक्तियों का स्रोत मस्तिष्क है। उनकी मान्यता है कि पिण्डली(गैगसियन) मस्तिष्क के भीतरी भाग में अर्थात् केंद्र में होती है। इसी स्थान में सभी तन्मात्राओं(शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध के सूक्ष्म रूप )के ठहरने का स्थान है। यहाँ से ही पीनियल ग्लैण्ड को निकलता है रसतत्व और यहाँ से ही दिव्य दृष्टि(तीसरा नेत्र) पिटीट्यूरी ग्लैण्ड और मेडुला आबलोंगेटा शरीर के सभी अवयवों को नियंत्रित करती है। फिरभी मस्तिष्क का महत्व कम नहीं है। मस्तिष्क की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए प्रसिद्ध जीवशास्त्री पंडित डा. एम्. डी.कुल ने वर्जिनियां के मेडिकल कालेज में भाषण देते हुए कहा था कि मनुष्य के जीवन का आधार ह्रदय नहीं, मस्तिष्क है। मस्तिष्क का अभीतक सम्पूर्ण रूप से विश्लेषण नहीं हो पाया है। वैज्ञानिकों ने इस सत्य को स्वीकार किया है कि मनुष्य का जीवन चेतन विज्ञान के स्थूल उपकरणों से नहीं समझा जा सकता है।

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